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स्वव्यस्त


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बुढ़ापा

Posted On: 25 Oct, 2017  
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Social Issues में

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‘स्कीम’

Posted On: 4 Oct, 2016  
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Politics Social Issues कविता में

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चुनावी-भूत

Posted On: 28 Sep, 2016  
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Politics कविता में

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शहर में कर्फ़्यू

Posted On: 27 Jun, 2016  
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में

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फिर एक पेड़ को कटते देखा

Posted On: 17 Jun, 2016  
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Hindi Sahitya कविता में

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याद में तिल-तिल तड़पना

Posted On: 15 Jun, 2016  
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Hindi Sahitya कविता में

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के द्वारा: स्वव्यस्त स्वव्यस्त

के द्वारा: स्वव्यस्त स्वव्यस्त

किसी के काम जो आये, उसे इन्सान कहते हैं। पराया दर्द अपनाये, उसे इन्सान कहते हैं॥ कभी धनवान है कितना, कभी इन्सान निर्धन है। कभी सुख है-कभी दु:ख है, इसी का नाम जीवन है। जो मुश्किल में न घबराये, उसे इन्सान कहते हैं।। यह दुनियाँ एक उलझन है, कहीं धोखा, कहीं ठोकर। कोई हँस-हँस के जीता है, कोई जीता है रो-रोकर। जो गिरकर फिर सँभल जाये, उसे इन्सान कहते हैं।। अगर गलती रुलाती है, तो राहें भी दिखाती है। मनुज गलती का पुतला है, वो अक्सर हो ही जाती है। जो कर ले ठीक गलती को, उसे इन्सान कहते हैं।। यों भरने को तो दुनियाँ में, पशु भी पेट भरते हैं। लिए इन्सान का दिल जो, वही परमार्थ करते हैं। पथिक जो बाँटकर खाये, उसे इन्सान कहते हैं।। [copied]

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